दो सहकमीर् थे। दोनों काम में अच्छे थे लेकिन बतार्व के मामले में एक-दूसरे से काफी भिन्न थे। पहला सहकमीर् जानता था कि उसकी गलतियां जबरन निकाली जाती हैं, इसलिए वह गलतियां निकालने वालों को बकशता नहीं था। वह ऐसे लोगों की गलतियां पकड़ने में जुटा रहता। कोई गलती पकड़ मेंआने पर सबके बीच ठीक वैसा ही प्रचारकरता जाता, जैसा कि कभी उस व्यक्ति ने इसके खिलाफ किया होता था। वह अपने दूसरे साथी से अक्सर इस बात पर नोराज होता था कि वह दूसरों की गलतियां ढ़ूंढ़़कर उन्हें शर्मिदा क्यों नहीं करता? या जब वे लोगउसे किसी गलती पर डांटते हैं, तो तुरंत अपनोबचाव क्यों नहीं करता? एक दिन जब इसनेउस मित्रा से इस बारे में पूछा, तब उसने बताया- मित्रा, मैं तुम्हें या तुम्हारे नजरिए को पूरी तरह गलत नहीं कह रहा, लेकिन मेरा मानना यह है कि यदि मैं किसी दूसरे की गलती ढ़ूंढ़ने में ही लगा रहा तो निश्चित तौर पर अपने काम में गलती कर बैठूंगा। [caption id="attachment_632" align="alignleft" width="300"] शिक्षाप्रद कहानि[/caption] इसलिए मैं ऐसा नहीं करता हूं। रही बात सामने वाले द्वारा मेरी गलती बताए जाने पर अपन...