शांति स्वरूप जी आराम कुर्षी से टिके गुमसुम बैठे प्रेम आश्रम में हो रही Father’s Dayकी तैयारियों को देखरहे थे! पिता और मातÎ दिवस को आश्रेम वाले विशेष रूपसे मना कर यहां रहने वाले बुजुर्गो को सम्मान देते हैं और उनके प्रति आदर का भाव प्रकट करते हैं! अब तो आश्रेमकी यह परंपरा ही हो गई है! इस दिन बिल्कुल उत्सव जैसावातावरण हो जाता है! यह आश्रेम भी परिवार की तरह हीतो है! चोंधियाई आंखों से शांतिस्वरूप जी ने आश्रेम के बाग में नजर डाली! दूधिया रोशनी में बोगनबेलिया कीफूलों भरी टहनियां उन्हें बहुत अच्छी लग रही थी।हवा के तेज झोंके खिड़की से अन्दर शांतिस्वरूप जीके कमरे तक आ रहे थे! Father’s Day के पहले दिन की यहशाम कुछ सिंदूरी थी! बोगेनबेलिया के बैंगनी फूल कुछअधिक मस्ती के साथ झूम रहे थे एवं मन को प्रफुलित कर रहे थे! वह सुकून से बैठे थे, पर बीच-बीच में एकदमसे बेचैन हो जाते थे! क्या कभी ऐसी बेचैनी की शांतिस्वरूप जी ने कल्पना की थी?वह आंखें मूंद कर याद करने लगे। आप Hindi की सबसे बड़ी Website जिस पर आपको हर प्रकार की जानकारी मिल जाएगी हर प्रकार की जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें और और हिंदी कहानियों के लि...